मध्यप्रदेश की राजनीति इन दिनों असाधारण उथल-पुथल से गुजर रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव लगातार तीखे और संगठित हमलों के केंद्र में हैं। सोशल मीडिया पर #RamDrohiMohanYadav जैसे हैशटैग ट्रेंड कराए जा रहे हैं, इंदौर में दूषित पानी से हुई मौतों को सीधे उनकी व्यक्तिगत नाकामी बताया जा रहा है, और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जी से जुड़े हर विवाद को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है।
लेकिन यदि इन घटनाओं को सतह से हटकर देखा जाए, तो एक अलग ही तस्वीर उभरती है|
MP में आखिर क्यू डॉ मोहन यादव ने शुरू की आरक्षण गाथा आप क्या सही मानते हैंMPके CM के आरक्षण की नीति को https://t.co/vrcu7KzwKB @PMO @narendramodi @AmitShah @JaipurDialogues @ajeetbharti @atsshow7 @AshwiniUpadhyay @DrMohanYadav51 @Amit_shukla999 #RamDrohiMohanYadav…
— Simran Singh Shukla Director Reva Tv Digital Media (@simranShuklajbl) October 4, 2025
क्या ये हमले वास्तव में शासन की विफलताओं को लेकर हैं, या फिर ओबीसी सशक्तीकरण की प्रक्रिया को रोकने का सुनियोजित प्रयास?
रामद्रोही मोहन यादव को मुख्यमंत्री पद से तुरंत हटाना चाहिए भाजपा को ।
— Ankur Mishra (@Ankur_mishra32) October 1, 2025
उनको शर्म आनी चाहिए जो लोग यहां मोहन यादव को डिफेंड कर रहे हैं @ajeetbharti भाई का ये वीडियो देखिए सच क्या है सबको पता है पर वो भी लिखने में डर लग रहा है इन लोगों को ।#RamDrohiMohanYadav pic.twitter.com/0hnJIaDKE7
ओबीसी आरक्षण बढ़ाने का मुद्दा: असली टकराव की जड़
विवादों के केंद्र में मुख्यमंत्री यादव की वह पहल है, जिसमें उन्होंने अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को शिक्षा और सरकारी नौकरियों में 27% आरक्षण देने की प्रतिबद्धता दोहराई है। वर्तमान में यह आरक्षण 14% है, जिसे बढ़ाकर एससी (16%) और एसटी (20%) के साथ कुल आरक्षण 73% तक ले जाने की योजना है।
डॉ. यादव सार्वजनिक मंचों से बार-बार कह चुके हैं कि यह फैसला “डंके की चोट पर” लागू किया जाएगा। यह मुद्दा नया नहीं है|
2019 में कमलनाथ सरकार द्वारा लाए गए अध्यादेश को सुप्रीम कोर्ट की 50% सीमा के कारण रोक दिया गया था। यादव सरकार ने उसी आधार को आगे बढ़ाते हुए सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल किया और पुराने महाजन आयोग की रिपोर्ट का हवाला दिया। अगस्त 2025 की सर्वदलीय बैठक में कांग्रेस सहित सभी दलों ने 27% ओबीसी आरक्षण का समर्थन भी किया।
हालांकि हलफनामे से जुड़े कुछ पुराने और संदर्भहीन अंश (जिनमें रामायण पर टिप्पणियां थीं) सोशल मीडिया पर वायरल कर दिए गए और पूरे मुद्दे को “हिंदू-विरोधी” बताने की कोशिश की गई। सरकार ने स्पष्ट किया कि ये दस्तावेज कांग्रेस काल के हैं और वर्तमान नीति से उनका सीधा संबंध नहीं है, फिर भी ट्रेंड्स और आरोप थमे नहीं।
गढ़े गए विवाद: आंबेडकर से लेकर पानी संकट तक
मुख्यमंत्री यादव पर हमले एक साथ कई मोर्चों पर किए जा रहे हैं।
एक ओर डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर जी से जुड़े विवादों को जानबूझकर उछाला गया
ग्वालियर हाईकोर्ट बेंच में प्रतिमा स्थापना विवाद हो या संसद में अमित शाह के बयान से जुड़ा हंगामा
इन सभी को राज्य सरकार से जोड़कर नैरेटिव गढ़ा गया,
मध्यप्रदेश के ग्वालियर में हाल ही में डॉ. भीमराव आंबेडकर जी की तस्वीर (झेरॉक्स पोस्टर) जलाने की घटना ने समाज में बड़ा बवाल मचा दिया। यह मामला ग्वालियर और भिंड जैसे जिलों में केंद्रित रहा, जहां मनुस्मृति जलाने के जवाब में कुछ असामाजिक तत्व ने आंबेडकर की तस्वीर जलाने या अपमान करने की कोशिश की। इससे कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठे और सरकार को “आंबेडकर विरोधी” करार दिया जाने लगा।दलित संगठनों भीम आर्मी आदी ने उग्र आंदोलन की चेतावनी दी।राष्ट्रव्यापी आक्रोश के बाद पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की|
समाज और दलित संगठनों का आक्रोश:
राष्ट्रव्यापी बवाल घटना की खबर फैलते ही दलित समुदाय और संगठनों में गुस्सा भड़क उठा:
ग्वालियर में आजाद समाज पार्टी, भीम आर्मी और अन्य दलित संगठनों ने कलेक्ट्रेट और एसपी ऑफिस पर धरना-प्रदर्शन किया।
एनएसए (राष्ट्रीय सुरक्षा कानून) लगाने और सख्त सजा की मांग की।
भीम आर्मी के राष्ट्रीय नेता चंद्रशेखर आजाद ने सोशल मीडिया पर इसे
“लोकतंत्र और सामाजिक न्याय पर खुली चुनौती” करार दिया।
अन्य जगहों पर भी प्रदर्शन हुए, और अगर कार्रवाई न हुई तो “उग्र आंदोलन” की चेतावनी दी गई।
कुछ संगठनों ने राज्यव्यापी बंद या मार्च की धमकी दी।
राष्ट्र स्तर पर बडी संख्या में आंबेडकर समर्थक आक्रोशित हुए,
क्योंकि बाबासाहेब को संविधान निर्माता और बहुजन समाज के मसीहा माना जाता है।
सरकार की कार्रवाई: दबाव में एक्शन
मोहन यादव सरकार पर शुरू में “आंबेडकर विरोधी” होने का आरोप लगा, क्योंकि कार्रवाई में देरी का दावा किया गया।
लेकिन राष्ट्रव्यापी दबाव और दलित संगठनों की चेतावनी के बाद त्वरित एक्शन लिया गया:
पुलिस ने तुरंत एफआईआर दर्ज की, आरोपियों को गिरफ्तार किया और जेल भेजा।
एससी/एसटी एक्ट के तहत केस चल रहा है।
हाईकोर्ट ने बेल पर सरकार से जवाब मांगा।
सीएम मोहन यादव ने ऐसे मामलों में सख्ती के निर्देश दिए हैं (पहले के दलित उत्पीड़न मामलों में भी रिपोर्ट मांगी गई थी)।
यह कार्रवाई दबाव का नतीजा मानी जा रही है, वरना विवाद और बढ़ सकता था।
जबकि यादव सरकार का आंबेडकर की विरासत के विरोध से कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिलता।
हालांकि, अब यह समझा जा रहा है कि इस घटना के पीछे का मकसद मोहन यादव की सरकार को अस्थिर करने की साजिश है।
दूसरी ओर, इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी से हुई मौतों को सीधे मुख्यमंत्री की विफलता करार दिया गया।
दिसंबर 2025–जनवरी 2026 के बीच 6 मौतों की पुष्टि हुई (स्थानीय दावे इससे अधिक बताते हैं) और 200 से अधिक लोग बीमार पड़े।
सरकार ने तत्काल कार्रवाई की,नगर आयुक्त को हटाया गया,अधिकारियों को निलंबित किया गया,
हजारों लोगों की स्क्रीनिंग और मुफ्त इलाज की व्यवस्था की गई,और पूरे प्रदेश की जल आपूर्ति प्रणाली की समीक्षा शुरू की गई।
इसके बावजूद इस संकट को “मोहन यादव की व्यक्तिगत नाकामी” के रूप में प्रचारित किया गया।
मनुवादी बनाम ओबीसी नेतृत्व?
इन सभी हमलों का समय और पैटर्न गौर करने लायक है।
दिसंबर 2023 में मुख्यमंत्री बने मोहन यादव एक ऐसे प्रदेश का नेतृत्व कर रहे हैं
जहां राजनीति लंबे समय से ऊपरी जाति वर्चस्व के इर्द-गिर्द घूमती रही है।
स्वयं ओबीसी समुदाय से आने वाले यादव की 27% आरक्षण पर दृढ़ता कई शक्तियों को असहज करती दिखती है।
मनुवादी आलोचक उन्हें “हिंदू विरोधी” “राम विरोधी” कहकर घेरने की कोशिश कर रहे हैं,
जबकि समर्थकों का तर्क है कि असली डर ओबीसी एकजुटता से है
वैसी एकजुटता, जिसने बिहार जैसे राज्यों में सत्ता संतुलन बदला।
निर्णायक सवाल: क्या ओबीसी समुदाय साथ खड़ा होगा?
मध्यप्रदेश की आबादी में ओबीसी वर्ग की हिस्सेदारी लगभग 50% है। सवाल यह नहीं है कि विवाद होंगे या नहीं|
सवाल यह है कि क्या यह वर्ग इन विवादों के पीछे छिपे एजेंडे को समझ पाएगा।
यदि ओबीसी समाज यादव की नीतियों को अपने दीर्घकालिक हित से जोड़कर देखता है,
तो ये हमले उल्टा असर डाल सकते हैं। यदि भ्रम और विभाजन हावी हुआ, तो पुरानी शक्ति संरचनाएं फिर मजबूत हो सकती हैं।
डॉ. मोहन यादव पर हो रहे हमले केवल प्रशासनिक कमियों की आलोचना नहीं लगते, बल्कि ओबीसी सशक्तीकरण की दिशा में उठाए गए कदमों को कमजोर करने का संगठित प्रयास प्रतीत होते हैं। तथ्यों की अतिशयोक्ति, संदर्भहीन दस्तावेजों का दुरुपयोग और सोशल मीडिया अभियानों का पैटर्न यही संकेत देता है।
अब फैसला मध्यप्रदेश की जनता के हाथ में है|
क्या वह प्रचार और भ्रम को चुनेगी, या समानता और प्रतिनिधित्व की राजनीति को। प्रदेश का भविष्य इसी विकल्प पर टिका है।

मिलिंद धुमाळे
संपादक
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First Published by Team Jaaglya Bharat on JAN 04,2025 | 07:00 AM
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