भारतीय समाज में जाति केवल सामाजिक संरचना नहीं, बल्कि सत्ता, संसाधन और अवसरों के वितरण को प्रभावित करने वाला एक ऐतिहासिक कारक रहा है। संविधान ने समानता और सामाजिक न्याय को राज्य की मूल जिम्मेदारी माना, लेकिन समय-समय पर ऐसे घटनाक्रम सामने आते हैं जो यह सवाल खड़ा करते हैं कि क्या प्रशासनिक तंत्र वास्तव में इस संवैधानिक भावना से मुक्त है।
उत्तर प्रदेश के पूर्व सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री का हालिया प्रकरण इसी व्यापक बहस को नए सिरे से सामने लाता है। यह मामला किसी एक अधिकारी के व्यक्तिगत विचारों तक सीमित नहीं है, बल्कि उस मानसिकता की ओर संकेत करता है जो अगर सत्ता और प्रशासनिक पदों तक पहुंच जाए, तो सामाजिक न्याय की पूरी व्यवस्था को प्रभावित कर सकती है।
अलंकार अग्निहोत्री का इस्तीफा और विवाद की जड़
पद से सस्पेण्ड हो चुके अलंकार अग्निहोत्री, एक पीसीएस अधिकारी थे, उन्होने 26 जनवरी 2026 को बरेली सिटी मजिस्ट्रेट पद से इस्तीफा दिया। उनके इस्तीफे का कारण बताया गया UGC Regulations 2026, जिनका उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में SC/ST/OBC छात्रों के खिलाफ जातीय भेदभाव को परिभाषित और रोकना था।
अलंकार अग्निहोत्री ने इन नियमों को “काला कानून” बताते हुए दावा किया कि इससे जनरल कैटेगरी के छात्रों के खिलाफ “फर्जी शिकायतों” का रास्ता खुलेगा और समाज में विभाजन बढ़ेगा। इस्तीफे के बाद उन्हें निलंबित किया गया।
इसके बाद उनका विरोध केवल UGC तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने SC/ST (Prevention of Atrocities) Act, 1989 को भी निशाने पर लेते हुए दावा किया कि इसके अंतर्गत 95% मामले फर्जी हैं| एक ऐसा दावा, जो न तो आधिकारिक आंकड़ों से पुष्ट है और न ही न्यायिक रूप से मान्य।
सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप और राजनीतिक भाषा
29 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने UGC Regulations 2026 पर अंतरिम रोक लगाई
और इन्हें prima facie vague तथा संभावित दुरुपयोग योग्य बताया।
अलंकार अग्निहोत्री ने इसे “लोकतंत्र की जीत” करार दिया।
लेकिन इसके बाद उनका बयानबाज़ी का स्तर और तीखा हो गया। SC/ST एक्ट को 6 फरवरी तक वापस न लेने पर “सरकार को उखाड़ फेंकने” जैसी भाषा और 7 फरवरी से तथाकथित ‘सवर्ण स्वाभिमान पदयात्रा’ का ऐलान, इस विवाद को प्रशासनिक बहस से निकालकर खुली जातीय ध्रुवीकरण की राजनीति में बदल देता है।
असली मुद्दा: व्यक्ति नहीं, मानसिकता
यहां सवाल किसी एक अलंकार अग्निहोत्री जैसे अधिकारी की मानसिकता का नहीं है,
बल्कि उस जातीय दृष्टिकोण का है जो प्रशासनिक पदों पर बैठे लोगों के फैसलों को प्रभावित कर सकता है।
1. सुरक्षा कानूनों के प्रति पूर्वाग्रह
SC/ST एक्ट और UGC जैसे प्रावधान ऐतिहासिक उत्पीड़न और संस्थागत भेदभाव की पृष्ठभूमि में बनाए गए हैं।
इन कानूनों को “रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन” बताकर कमजोर करने की प्रवृत्ति यह संकेत देती है कि सामाजिक असमानता को अब भी पूरी तरह स्वीकार नहीं किया गया है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार SC/ST एक्ट के तहत दोषसिद्धि दर लगभग 30–40% है।
यह आंकड़ा यह नहीं दर्शाता कि अधिकांश मामले फर्जी हैं, बल्कि यह बताता है कि:
जांच की गुणवत्ता कमजोर है
गवाहों पर दबाव पड़ता है
पीड़ित अक्सर सामाजिक-आर्थिक रूप से कमजोर होते हैं
लेकिन जब प्रशासनिक स्तर पर ही शिकायतों को “झूठा” मानने की मानसिकता हो, तो न्याय की संभावना और कम हो जाती है।
2. “विभाजन” का तर्क और उसकी विडंबना
सुप्रीम कोर्ट ने UGC नियमों पर रोक लगाते समय समाज में विभाजन की आशंका जताई।
लेकिन विरोध करने वालों द्वारा इस्तेमाल की जा रही भाषा
“सवर्ण स्वाभिमान”, “ब्राह्मण शेर” जैसे नारे स्वयं उस विभाजन को और गहरा करती है।
इतिहास गवाह है कि संस्थागत पूर्वाग्रह किस तरह रोहित वेमुला जैसे मामलों में त्रासदी का कारण बने।
यह केवल व्यक्तिगत भेदभाव नहीं, बल्कि सिस्टम के भीतर जमी हुई सोच का परिणाम होता है।
3. राजनीतिक अवसरवाद का संकेत
आलोचकों का एक वर्ग इस पूरे घटनाक्रम को लोकसभा चुनावों से पहले सवर्ण वोट बैंक के ध्रुवीकरण के रूप में देख रहा है।
अगर यह आकलन सही है, तो सवाल और गंभीर हो जाता है|
अगर यही मानसिकता सत्ता में रहते हुए नीतियां तय करे, तो संविधान की समानता की भावना का क्या होगा?
संतुलन की जरूरत: दुरुपयोग बनाम न्याय
यह भी सत्य है कि किसी भी कानून का दुरुपयोग संभव है।
जनरल कैटेगरी की यह चिंता पूरी तरह खारिज नहीं की जा सकती कि फर्जी शिकायतें समस्या पैदा करती हैं।
लेकिन समाधान:
कानून खत्म करना नहीं
बल्कि बेहतर जांच, स्पष्ट दिशानिर्देश और जवाबदेही है
सुरक्षा कानूनों को कमजोर करना अंततः उन्हीं वर्गों को नुकसान पहुंचाता है,
जिनके लिए संविधान ने विशेष संरक्षण की व्यवस्था की है।
व्यापक प्रभाव: अगर ऐसी मानसिकता सिस्टम में हावी हो जाए
यदि जातीय पूर्वाग्रह से ग्रस्त सोच प्रशासन में प्रभावशाली हो जाए, तो इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं:
न्याय में देरी और पक्षपात
SC/ST/OBC शिकायतों को “पहले से फर्जी” मान लेने की प्रवृत्ति
सामाजिक आंदोलनों के नाम पर तनाव और हिंसा
समानता-आधारित नीतियों पर लगातार हमले
यह स्थिति केवल सामाजिक नहीं, बल्कि संवैधानिक संकट भी बन सकती है।
निष्कर्ष: बहस व्यक्ति नहीं, व्यवस्था पर हो
अलंकार अग्निहोत्री का मामला एक चेतावनी है।
चर्चा इस पर नहीं होनी चाहिए कि उन्होंने क्या कहा,
बल्कि इस पर होनी चाहिए कि अगर ऐसी सोच प्रशासनिक फैसलों का आधार बन जाए तो समाज किस दिशा में जाएगा।
विरोध की भाषा और उसकी असहज सच्चाई
UGC रेगुलेशंस के विरोध के दौरान एक और गंभीर पहलू सामने आया, जिस पर अपेक्षित चर्चा नहीं हुई।
सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर कुछ विरोधी समूहों द्वारा देश के प्रधानमंत्री के खिलाफ जातिसूचक और अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया गया।
“तेली” जैसे शब्दों का इस्तेमाल और “मोदी तेरी कब्र खुदेगी” जैसी अभिव्यक्तियाँ केवल राजनीतिक असहमति नहीं,
बल्कि खुली जातीय घृणा और हिंसक मानसिकता को दर्शाती हैं।
यह बिंदु इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उस दावे की पोल खोलता है कि UGC जैसे नियम “सामान्य वर्ग के छात्रों को खतरे में डालते हैं”।
अगर विरोध करते समय ही भाषा इस स्तर तक गिर सकती है|
तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि बिना किसी नियामक और सुरक्षा ढांचे के,
सत्ता या संस्थानों में मौजूद ऐसी सोच आम नागरिकों, खासकर छात्रों, के साथ कैसा व्यवहार करेगी?
क्या यह अपने आप में सबूत नहीं है?
प्रधानमंत्री पद किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि संवैधानिक संस्था का प्रतिनिधित्व करता है।
यदि उसी पद के लिए जातिसूचक गालियां दी जा सकती हैं, तो यह मानना कठिन नहीं कि:
जाति आधारित सोच कितनी गहरी है
“जनरल कैटेगरी बनाम अन्य” का नैरेटिव कितनी जल्दी घृणा में बदल सकता है
यह तर्क और भी कमजोर हो जाता है कि UGC नियम समाज को बांटते हैं, क्योंकि विभाजन तो पहले से मौजूद है|
और वह विभाजन बिना किसी कानून के भी खुलकर सामने आ रहा है।
भाषा, सत्ता और नैतिक जिम्मेदारी
लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध का अधिकार सभी को है।
लेकिन जब विरोध:
जातीय पहचान को निशाना बनाए
हिंसा की भाषा अपनाए
और संवैधानिक पदों को अपमानित करे
तो वह विरोध नहीं, बल्कि सामाजिक विघटन बन जाता है।
यह वही मानसिकता है जिसे UGC रेगुलेशंस और SC/ST एक्ट जैसे कानून नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं
ताकि व्यक्तिगत पूर्वाग्रह संस्थागत अन्याय में न बदल जाए।
संदर्भ में व्यापक सवाल
यह घटनाक्रम एक असहज लेकिन जरूरी सवाल खड़ा करता है:
यदि कानून और निगरानी के बावजूद संवैधानिक पदों के लिए जातीय अपशब्दों का प्रयोग संभव है,
तो बिना किसी सुरक्षा तंत्र के छात्र, कर्मचारी और कमजोर वर्ग कैसे सुरक्षित रहेंगे?
यह सवाल केवल SC/ST/OBC तक सीमित नहीं है।
यह पूरे समाज से जुड़ा है,क्योंकि जातीय घृणा अंततः किसी एक वर्ग पर रुकती नहीं।
भारत को ऐसे कानून चाहिए जो:
दुरुपयोग रोकें
लेकिन कमजोर वर्गों को असुरक्षित न करें
संविधान जाति-आधारित श्रेष्ठता नहीं, बल्कि समान गरिमा की बात करता है।
समावेशी भारत का रास्ता संवाद, सुधार और संवैधानिक मूल्यों से होकर गुजरता है
न कि विभाजनकारी नारों और पहचान की राजनीति से।

Milind Dhumale
is an editor and political–social affairs analyst with a sharp focus on constitutional values, social justice, and power structures in contemporary India. His writing examines caste, governance, law, and public policy through a fact-based, critical lens, aiming to challenge dominant narratives and highlight voices often pushed to the margins. Known for clarity, depth, and editorial rigor, he brings analytical precision to issues that shape democracy and social equity.
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First Published by Team Jaaglya Bharat on FEB 03,2026 | 20:20 PM
WebTitle – Casteist Rhetoric, Administrative Bias and the UGC Row: What the Language of Protest Reveals























































